खाद-बीज संकट से बढ़ रही किसानों की चिंता, समय पर व्यवस्था नहीं सुधरी तो आंदोलन तय*
दो किस्तों में यूरिया वितरण, समितियों में भीड़, बीज सप्लाई ठप और निजी बाजार में खाद संकट से ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ा असंतोष

दुर्ग ///
धान सीजन शुरू होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में खाद-बीज को लेकर किसानों की चिंता लगातार बढ़ने लगी है। सहकारी समितियों और सेवा केंद्रों में किसानों की लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं, वहीं कई स्थानों पर खाद की सीमित उपलब्धता, वितरण में देरी और नई व्यवस्था को लेकर किसानों में असंतोष पनपने लगा है। विशेष रूप से 5 एकड़ से अधिक भूमि वाले किसानों को यूरिया दो किस्तों में देने की व्यवस्था को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
किसानों का कहना है कि धान की खेती पूरी तरह समय पर निर्भर होती है। बोआई और रोपाई के दौरान यदि DAP, यूरिया, पोटाश या अन्य उर्वरक समय पर नहीं मिला तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ता है। वर्तमान व्यवस्था में बड़े किसानों को यूरिया दो चरणों में मिलने से उन्हें बार-बार समिति के चक्कर लगाने पड़ेंगे, जिससे समय, मजदूरी और परिवहन खर्च बढ़ेगा। ग्रामीण क्षेत्रों में पहले से ही कई समितियों में स्टॉक और वितरण व्यवस्था को लेकर शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे में दूसरी किस्त समय पर मिलेगी या नहीं, इसे लेकर किसानों में चिंता स्वाभाविक है।
किसानों ने बताया कि पूर्व वर्षों में प्रति एकड़ लगभग 2 बोरी यूरिया, 1 बोरी DAP तथा 2 बोरी पोटाश उपलब्ध कराया जाता था, जिससे फसल की बढ़वार और उत्पादन बेहतर होता था। किसानों का यह भी कहना है कि पहले उपलब्ध कराए जाने वाले उर्वरकों की गुणवत्ता भी बेहतर रहती थी, जबकि वर्तमान में उपलब्ध खाद का असर खेतों में कमजोर दिखाई दे रहा है। इससे किसानों में उत्पादन घटने की आशंका बढ़ती जा रही है।
क्षेत्र के किसानों का यह भी कहना है कि कई बार सहकारी समितियों में पर्याप्त खाद उपलब्ध नहीं होता, जिसके कारण उन्हें निजी दुकानों से अधिक कीमत पर खाद खरीदना पड़ता है। वर्तमान स्थिति यह बन रही है कि रासायनिक उर्वरकों की अनुशंसित मात्रा एवं सीमित आपूर्ति व्यवस्था के चलते खुले बाजार और निजी दुकानों में भी खाद मिलना मुश्किल होता जा रहा है। कई स्थानों पर स्टॉक समाप्त होने और अधिक कीमत वसूली की शिकायतें सामने आ रही हैं। इससे खेती की लागत लगातार बढ़ रही है। नकली या घटिया खाद-बीज का खतरा भी किसानों के सामने बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है। दूसरी ओर डीजल, मजदूरी और कीटनाशकों की बढ़ती कीमतों ने खेती को और महंगा बना दिया है।
किसानों ने यह भी आरोप लगाया कि वर्तमान में कई समितियों में धान बीज की सप्लाई भी लगभग ठप पड़ी हुई है। किसान समय पर प्रमाणित बीज नहीं मिलने से परेशान हैं और मजबूरी में निजी दुकानों का सहारा लेने को विवश हो रहे हैं। इससे छोटे और मध्यम किसानों की आर्थिक स्थिति पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।
इस पूरे मामले में किसान नेता एवं सामाजिक कार्यकर्ता ढालेश साहू ने किसानों की समस्याओं को गंभीर बताते हुए केंद्र एवं राज्य सरकार से तत्काल व्यवस्था सुधारने की मांग की है। उन्होंने कहा कि यदि खाद वितरण व्यवस्था में पारदर्शिता और समयबद्धता नहीं लाई गई तो आने वाले दिनों में किसानों का आक्रोश आंदोलन का रूप ले सकता है। सहकारी समितियों का घेराव, धरना-प्रदर्शन, ट्रैक्टर रैली और कलेक्टर कार्यालय तक आंदोलन की स्थिति बन सकती है।
ढालेश साहू ने कहा कि किसान केवल अपनी फसल नहीं बचा रहा, बल्कि पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र को संभाले हुए है। ऐसे में खाद-बीज जैसी मूलभूत आवश्यकता में लापरवाही किसानों के भविष्य और कृषि व्यवस्था दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकती है। उन्होंने केंद्र व राज्य सरकार से किसानों की समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए समय पर पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तायुक्त खाद और प्रमाणित बीज उपलब्ध कराने, दो किस्तों में यूरिया वितरण की व्यवस्था समाप्त करने तथा सभी समितियों में पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने की मांग की है।
अंत में उन्होंने कहा कि “जय जवान – जय किसान” केवल नारा नहीं बल्कि देश की आत्मा है। यदि किसान सुरक्षित और मजबूत रहेगा तभी देश की अर्थव्यवस्था और ग्रामीण व्यवस्था मजबूत रह पाएगी।