झलमला गंगा मैय्या मंदिर में अनोखी परंपरा – हर साल पुरुष ही करते हैं जोत जंवारा विसर्जन

रिपोर्ट – एम डी युसुफ खान
अंडा // दुर्ग // बालोद
बालोद // चैत्र नवरात्रि के समापन अवसर पर झलमला स्थित गंगा मैया मंदिर में हर वर्ष की तरह इस बार भी जोत जवारा विसर्जन का भव्य आयोजन श्रद्धा और भक्ति के साथ संपन्न हुआ। पूरे इलाके से बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस आयोजन में शामिल हुए। और पूरे इलाके में जयकारों भजन कीर्तन व ढोल नगाड़ों की गूंज से वातावरण भक्तिमय बना रहा।
सिर्फ पुरुष ही निभाते हैं यह अनोखी परंपरा
इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि हर साल केवल पुरुष उसमें भी कुंवारे लड़के श्रद्धालु ही ज्योत और जावरा धारण कर विसर्जन के लिए निकलते हैं ।नवरात्रि के नौ दिनों तक बोए गए जोत जंवारा को माता का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है ।और समापन के दिन पुरुष श्रद्धालु सर पर जोत जवारा रखकर मंदिर से शोभायात्रा के रूप में पास के तालाब तक जाते हैं ।जहां विधि-विधान के साथ विसर्जन किया जाता है।
भव्य शोभायात्रा
शोभा यात्रा के दौरान श्रद्धालु अनुशासन और परंपरा के साथ आगे बढ़ते हैं। रास्ते में जगह-जगह स्वागत और प्रसाद वितरण किया जाता है ।जय माता दी के जयकारों के बीच यह यात्रा पूरे क्षेत्र में आस्था का संदेश फैलाती है। तालाब पहुंचकर पूरे विधि विधान के साथ जवारा विसर्जन किया जाता है।
गंगा मैय्या का इतिहास
झलमला का गंगा मैया मंदिर करीब 130 साल पुराना माना जाता है । उस समय बालोद जिले की जीवनदायनी तांदुला नदी से नहर निर्माण का कार्य चल रहा था ।और झलमला गांव की आबादी महज 100 के आसपास थी। सोमवार को यहां बाजार लगता था। जहां दूर-दूर से लोग और पशु बड़ी संख्या में पहुंचते थे ।पानी की कमी को देखते हुए एक डबरी की खुदाई कर तालाब बनाया गया ।जिसे बांधा तालाब कहा गया ।मान्यता के अनुसार सिवनी गांव का एक केवट इसी तालाब में मछली पकड़ने गया था ।जहां उसके जाल में मछली की जगह एक पत्थर की प्रतिमा फंसी उसने उसे साधारण पत्थर समझ कर वापस तालाब में फेक दिया। बाद में गांव के गोड़ जाति के बैगा को माता ने सपने में दर्शन देकर बताया कि वह जल में पड़ी है ।और उन्हें बाहर निकाल कर स्थापित किया जाए इसके बाद तालाब में दोबारा जाल डाला गया ।और वही प्रतिमा पुनः प्राप्त हुई जिसे विधि विधान से स्थापित किया गया।
मैय्याजी को अंग्रेज भी नहीं हटा सके
कहां जाता है कि नहर निर्माण के दौरान अंग्रेज अधिकारी एडम स्मिथ ने इस प्रतिमा को हटाने की बहुत कोशिशें की लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो सके ।इससे मंदिर की आस्था और भी मजबूत हो गई।
मुंडन संस्कार के लिए प्रसिद्ध स्थल
यह मंदिर केवल नवरात्रि ही नहीं बल्कि मुंडन संस्कार के लिए भी पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है नवरात्रि के दौरान यहां बड़ी संख्या मेंलोग अपने बच्चों का मुंडन करने पहुंचते हैं ।साथ ही मंदिर परिसर में ज्योति कलश दर्शन के लिए विशेष स्थल भी बनाया गया है। जहां श्रद्धालु ज्योत का दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
हर साल आयोजित होने वाला यह जोत जवारा विसर्जन और मंदिर की गौरवशाली परंपरा झलमला को विशेष पहचान देती है।यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है बल्कि सामाजिक एकजुटता और सांस्कृतिक विरासत को भी मजबूत करता है।