सरकार का सिस्टम फेल शिक्षा सत्र शुरु, पर किताबें व गणवेश आधे अधूरे
संपादक -- एम डी युसुफ खान अंडा - दुर्ग Ⓜ️ 9179799491

राजनांदगांव // 04,/07/26
समय पर स्कूल आओ शत प्रतिशत रिजल्ट दो ,वरणा नप जाओगे, यह वह सख्त लहजा है जो सरकार और शिक्षा विभाग के आला अधिकारी हर छोटे बड़े मंच से शिक्षकों को घुड़की देने के लिए इस्तेमाल करते हैं । लेकिन जब खुद की बारी आई तो दांवो की सारी हवा निकल गई । 16 जून से नया शिक्षा सत्र धूमधाम से शुरू कर दिया गया । ढोल नगाड़े बजाकर बच्चों का स्वागत हुआ लेकिन सत्र करीब आधा महीना बीत जाने के बाद भी नव निहालों के हाथ खाली हैं किताबें आज तक आधी अधूरी बंटी है। कहीं पूरी कक्षा की किताबें गायब है, तो कहीं किसी खास विषय की किताब का पता पता नहीं है। यही हाल मुफ्त गणवेश योजना का है। वादे दो सेट किए थे लेकिन बच्चों को थमाया गया है सिर्फ एक सेट ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जो सरकार शिक्षकों पर लगातार दबाव बनाती है।
वह खुद नए सत्र को लेकर इतनी लापरवाह क्यों थी। अव्यवस्था का आलम ऐसा है कि कहीं गणित गायब है, कहीं पूरी क्लास खाली ,जमीनी हकीकत यह है कि स्कूलों में बच्चे तो पहुंच रहे हैं लेकिन बिना किताबों के पढ़ाई केवल ब्लैक बोर्ड और हवा में हो रही है जिले से आ रही रिपोर्ट के मुताबिक विषयों का संकट किसी स्कूल में हिंदी की किताब आ गई है तो गणित और विज्ञान का वंडर गोदाम में धूल खा रहा है कक्षा छठवीं और आठवीं जैसी महत्वपूर्ण कक्षाओं की पुस्तक कई संकलन में आज तक डिलीवर ही नहीं की जा रही है बारिश के इस मौसम में बच्चों को सिर्फ़ एक सेट यूनीफार्म दिया गया है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर बच्चा एक दिन यूनिफॉर्म धोएगा तो अगले दिन क्या पहन कर स्कूल जाएगा। महीना पहले से स्कूल चलो अभियान और सत्र की तैयारी की लंबी चौड़ी बैठकें एसी कमरों में की जा रही थी। जिला शिक्षा अधिकारियों से लेकर ब्लाक अधिकारियों तक बड़े-बड़े टारगेट दिए गए थे। शिक्षकों को डराया गया कि अगर 16 जून को व्यवस्था चाक चौबंद नहीं मिली तो वेतन कटेगा या सस्पेंशन होगा। जब पाठ्य पुस्तक निगम को पता था कि सत्र 16 जून से शुरू होना है तो अप्रैल और मई के महीना में छपाई और परिवहन का काम क्यों पूरा नहीं किया गया।
क्या सरकार का इंटिजिलेंश और मैनेजमेंट इतना कमजोर है कि उसे किताबों की कमी का पता ही नहीं लगा। क्या अब होगी जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई या या फिर बलि का बकरा बनेंगे शिक्षक अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि इस महा असफलता की जिम्मेदारी कौन लेगा क्या शिक्षा विभाग के उन बड़े नीति निर्माताओं और आईएएस अफसर पर गाज गिरेगी इन्होंने समय पर टेंडर और सप्लाई चैन को दुरुस्त नहीं किया या फिर हर बार की तरह इस बार भी असफलता का ठीकरा जिले के छोटे अधिकारियों प्राचार्यों और निरीह शिक्षकों पर फोड़ दिया जाएगा। विभाग में यह ट्रेंड चल रहा है। गलती ऊपर से हो तो नीचे वालों को कारण बताओं नोटिस थमा दो, अगर समय रहते पूरे विषय की किताबें और दूसरा सेट गणवेश नहीं मिला तो बच्चों की इस सत्र पढ़ाई का नुक़सान होगा। सरकार उसकी भरपाई कैसे करेगी। फिलहाल जनता और शिक्षक संघ इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि सरकार अपनी नाकामी स्वीकार कर कब तक व्यवस्था को पटरी पर लाती है।